| होलिकोत्सव |
बसंत की खुमारी के साथ ही फागुन के महीने में पूरा माहौल रंगीन हो जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन रंगों की बौछार होती है। हर जगह होता है उत्साह। रंगों की खुमारी में होता है मस्ती भरा धमाल। यह जाति-भेद, ऊंच-नीच,अमीरी- गरीबी से ऊपर उठकर मित्रता और भाईचारे का त्योहार है। इस दिन तो दुश्मनों को भी गले लगाने में हिचक नहीं होती। गले मिलकर सब भूल जाते हैं गिले शिकवे। बच्चे हों या बूढे। उम्र का अंतर भी खत्म हो जाता है। कहने का मतलब यह है कि गम को भूल कर खुशियों में इजाफा करने, प्यार देने और प्यार लेने के दिन का नाम है होलिकोत्सव या होली। |
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| होलिका दहन का मुहूर्त |
| होलिका दहन 28 फरवरी को होगा। ज्योतिषाचार्य पं.बृजकिशोर पाठक के अनुसार रात 9.53 तक पूर्णमासी है। इसे देखते हुए रात 8.30 से 10.30 बजे तक का समय होलिका दहन के लिए उत्तम है। पं. राजकुमार शर्मा के अनुसार होलिका दहन भद्रा रहित समय से पूर्व किया जाता है। होलिका दहन से पूर्व पंचोपचार पूजन किया जाना चाहिए। |
| होली पूजा |
| होली मुख्य रूप से रंग और अबीर का त्यौहार है। इसे धुलंडी के नाम से भी जाना जाता है। इससे एक दिन पूर्व "होलिका दहन" किया जाता है। दहन से पहले नव विवाहिताएं एवं महिलाएं होली की पूजा करती हैं और अपने पति, बच्चों और परिवार की मंगल कामना करतीं हैं। महिलाएं बडकुलों से होलिका की पूजा करती हैं। इसके बाद होलिका दहन किया जाता है। लोग होली की राख को अपने अपने घरों में ले जाते हैं और उससे घरों की शुद्धि करते हैं। 3रीर में ही बैठ जाते हैं। सीसा रक्त में रह जाए तो रक्त कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो सकती है। जिंक क्लोराइड से तैयार रंग से त्वचा में अलसर हो सकते हैं। |
Thursday, March 11, 2010
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