Friday, March 5, 2010
कितनी रोई होगी रात
कितनी रोई होगी रात
मिलकर, चंद्रमा के साथ
अभी भी दमक रहे आंसू
ओस बनकर।
ठहरो!
नंगे पैर चलते
सहेज लेने दो मुझे
इन बूंदों को,
जो बिछुड गई पलकों से
गनीमत है
बचाए रखा हरी घास ने।
आओ सोचें
रात के दर्द के बारे में
कल्पना करें उन शब्दों की
जिन्हें चंद्रमा ने
दिल रखने के लिए कहे होंगे
रात के कानों में धीरे-धीरे।
मिलकर, चंद्रमा के साथ
अभी भी दमक रहे आंसू
ओस बनकर।
ठहरो!
नंगे पैर चलते
सहेज लेने दो मुझे
इन बूंदों को,
जो बिछुड गई पलकों से
गनीमत है
बचाए रखा हरी घास ने।
आओ सोचें
रात के दर्द के बारे में
कल्पना करें उन शब्दों की
जिन्हें चंद्रमा ने
दिल रखने के लिए कहे होंगे
रात के कानों में धीरे-धीरे।
शब्द
शब्दों ने स्याही का
लिबास पहना
और वे कविता हो गए
अब वे किसी को
जख्मी नहीं कर सकते।
कविता जख्म करती नहीं
भरती है
अब वे किसी से
कुछ भी वसूल नहीं पाएंगे
कविता सिर्फ
देना जानती है
वसूलना नहीं।
लिबास पहना
और वे कविता हो गए
अब वे किसी को
जख्मी नहीं कर सकते।
कविता जख्म करती नहीं
भरती है
अब वे किसी से
कुछ भी वसूल नहीं पाएंगे
कविता सिर्फ
देना जानती है
वसूलना नहीं।
जिस तरह शब्दों ने
स्याही का लिबास पहना
वैसे ही आदमी भी
पहनता है शब्दों को
मगर उसमें नहीं होता
कोई परिवर्तन।
होता यह है कि
वह भेड से भेडिया
बन जाता है
शब्द पहनते ही
सूख जाती है
उसकी सारी नमी
और वह सूखे काठ की तरह
तन जाता है
कभी-कभी
सोचता हूं
शब्द और शब्द में
इतना फर्क क्यों है
गजल
वह मुझसे अब खफा हो गया है
उसका लफ्ज बददुआ हो गया है
उसका लफ्ज बददुआ हो गया है
काम करना बहुत मुश्किल हो गया है
मेरा हाथ मुझसे जुदा हो गया है
पानी को कौन नीचे खींच रहा है
पानी में गहरा कुआं हो गया है
इस शख्स का बचना अब मुश्किल है
जख्म बहुत ही गहरा हो गया है
पैसा पास हो तो खरीद लो कानून
पैसा कानून से बडा हो गया है।
sher
आइना हो जो मुकाबिल तो संवर जाना भी,
किसी की झील सी आंखों में उतर जाना भी।
जिस्म की हद से किसी रोज गुजर जाना भी,
खुशबुओं सा कभी हर सिम्त बिखर जाना भी।
उसमें सहरा भी है ये जान सकोगे कैसे,
तुमने कश्ती से समंदर को अगर जाना भी।
दिल की बस्ती की तरफ भी कभी हो लेते तुम,
किसी की झील सी आंखों में उतर जाना भी।
जिस्म की हद से किसी रोज गुजर जाना भी,
खुशबुओं सा कभी हर सिम्त बिखर जाना भी।
उसमें सहरा भी है ये जान सकोगे कैसे,
तुमने कश्ती से समंदर को अगर जाना भी।
दिल की बस्ती की तरफ भी कभी हो लेते तुम,
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