'प्रिय सोमेन! तुम्हें शायद याद हो, हम महाराजा कॉलेज होस्टल में साथ-साथ रहा करते थे। तुम ग्राउंड फ्लोर के रू म नं. 33 में रहते थे और मैं तुम्हारे कमरे से एक कमरा छोडकर रू म नं. 35 में। तुम बांसुरी कितनी अच्छी बजाते थे। और मैं टेबल पर तबला बजाकर तुम्हारी संगत करता था। याद आया, कॉलेज वीक सेलिब्ा्रेशन मनाने की पूरी रू परेखा तुमने, मैंने और दिल्ली के अडवानी ने मिलकर बनाई थी। पूरे सप्ताह के इस रंगारंग कार्यक्रम में सामने महारानी कॉलेज की लडकियों को भी हमने पार्टीसिपेट करने के लिए राजी कर लिया था। उन दिनों ये बहुत बडी सफलता थी। संगीत, कॉमेडी और ड्रामे से भरपूर इस कार्यक्रम के लिए तुम्हें याद होगा, प्रिंसिपल कपूर और हॉस्टल के वार्डन सक्सेना साहब खुद चलकर तुम्हारे कमरे पर आए थे, बधाई देने। तुम आश्चर्य कर रहे होंगे कि तीस-पैंतीस साल के अरसे के बाद मुझे तुम्हारी अचानक याद कैसे आ गई पहली बात तो ये कि मेरे पास तुम्हारा एड्रेस नहीं था सिर्फ यादें थीं बीते वक्त की। फिर मेरा उधर आना नहीं हुआ। आता भी तो किससे पता पूछता तुम्हारा वो तो एक दिन अखबार में तुम्हारी रहस्यमयी कहानी नजर आ गई। मुझे ये भी तय नहीं था कि वो लेखक तुम्हीं हो। ये तो मुझे मालूम था कि तुम्हें भूत-प्रेत के अस्तित्व और अन्य रहस्यमयी बातों में बहुत इंट्रेस्ट था, लेकिन यार! तुम लेखक कब से बन गए अखबार के संपादक से तुम्हारा एड्रेस मिला, इसके साथ ही संयोगवश ट्रेन में दुबे से मुलाकात हो गई। याद है वो बंदा, जो सुबह पहले हॉस्टल के ग्राउंड में लगी पैरेलल बार पर कसरत किया करता था और माउथ ऑर्गन पर अच्छी धुनें बजाता था। उसकी बजाई हुई धुनें अभी भी कानों में गूंजती हैैं। उसने भी तुम्हारे बारे में जानकारी दी थी। अब मैं तुम्हारी वो चीज तुम्हें लौटाना चाह रहा हूं, जो मैंने तुमसे बिना मांगे चुरा ली थी। सोचो! खूब सोचो! याद नहीं आया तुम्हारे यहां आने पर वो चीज देकर तुम्हें सरप्राइज दूंगा। दिल पर एक बोझ है कि वो चीज मैं तुम्हें लौटाऊं और तुमसे माफी मांगूं। तुम्हें मेरा पता ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं आएगी, किसी से भी पूछ लेना कि ठाकुर कुलदीप सिंह का महल कहां है मैं रेलवे स्टेशन पर तुम्हें रिसीव करने के लिए किसी को भेज दूंगा। मैं आता, पर मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम से मिलूं और तुम्हें तुम्हारी चीज लौटाकर अपने दिल का बोझ हल्का करू ं। तुम जरू र-जरू र आना! आखिर में लिखा था, 'अपनी यादों के उजाले मेरे पास रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।' तुम्हारे इंतजार में, कुलदीप सोलंकी। | ||||
Saturday, March 6, 2010
वो डायरी!
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