कितनी रोई होगी रात
मिलकर, चंद्रमा के साथ
अभी भी दमक रहे आंसू
ओस बनकर।
ठहरो!
नंगे पैर चलते
सहेज लेने दो मुझे
इन बूंदों को,
जो बिछुड गई पलकों से
गनीमत है
बचाए रखा हरी घास ने।
आओ सोचें
रात के दर्द के बारे में
कल्पना करें उन शब्दों की
जिन्हें चंद्रमा ने
दिल रखने के लिए कहे होंगे
रात के कानों में धीरे-धीरे।
Friday, March 5, 2010
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