मालदीव चाहता है कि दिसंबर में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक में विश्व के नेता कार्बन उत्सर्जन में कटौती की संधि पर हस्ताक्षर करें। राष्ट्रपति ने इस बैठक में कहा,'अगर मालदीव को नहीं बचाया गया, तो कल दुनिया के बचने की भी उम्मीद मत कीजिए।' ग्लोबल वामिंüग के चलते पिघलते ग्लेशियर मालदीव और बांग्लादेश के लिए सबसे बडा खतरा बने हुए हैं। वैज्ञानिकों ने साफ कह दिया है कि ग्लोबल वामिंüग का पहला शिकार मालदीव ही बनेगा। खतरा सिर्फ मालदीव पर ही नहीं है, भारत के समुद्रतटीय इलाकों पर भी खतरा मंडरा रहा है। भारत के सुंदरवन डेल्टा के करीब सौ द्वीपों में से दो द्वीपों को समुद्र ने हाल ही में निगल लिया है और करीब एक दर्जन द्वीपों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। इन द्वीपों पर करीब दस हजार आदिवासियों की आबादी है। यदि ये द्वीप डूबते हैं तो यह आबादी भी डूब सकती है। ग्लेशियर पिघलने के खतरे से भारत और चीन चेत गए हैं। हाल ही में दोनों देशों में इस मसौदे पर बैठक हुई और तय किया गया कि ग्लेशियर पिघलने का अध्ययन करने और वास्तविक स्थिति जानने के लिए दोनों देश एक दल भेजेंगे। दोनों देशों को ये पता है कि पिघलते ग्लेशियर से कई ऎसी नदियों में बाढ आ जाएगी, जिनके किनारे लाखों लोग बसते हैं। भारत और चीन के वैज्ञानिक और पर्वतारोही अब उन ग्लेशियरों पर जाएंगे, जहां से सतलुज और ब्र±मपुत्र नदियां निकलती हैं। तिब्बत के पर्वतों से बहकर आई ये दोनों नदियां गंगा और सिंधु नदियों के साथ मिलकर उत्तर भारत और पडोसी देशों के करोडों लोगों को पानी मुहैया कराती हैं। वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्लूडब्लूएफ) ने हिमालय के ग्लेशियर पिघलने पर खासी चिंता जताई है। संस्था के मुताबिक ग्लेशियर पिघलने से आने वाले दिनों में करोडों लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड सकता है। यही नहीं भारत, चीन और नेपाल भयानक बाढ आ सकती है, लेकिन बाद में सूखे की स्थिति सामने आएगी। खतरा पूरी दुनिया पर है, लेकिन अभी भी विकसित देश भविष्य की इस प्राकृतिक प्रलय को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण से जुडे मुद्दों पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक सदी के आखिर तक ग्लोबल वामिंüग के चलते अफ्रीका में 18 करोड 40 लाख लोगों की मौत हो सकती है। अफ्रीका में बाढ, सूखा, अकाल और संघर्ष बढ रहे हैं जो लोगों की मौत का कारण बन सकते हैं। ग्लोबल वामिंüग के चलते पिघलते ग्लेशियरों का खतरा रोकने के लिए पूरी दुनिया को एकगजुट होना होगा। क्योंकि पिघलते ग्लेशियर के खतरे का सामना आज तो केवल मालदीव ही कर रहा है, लेकिन अब भी हम नहीं संभले तो हो सकता है आने वाले वक्त में पूरी दुनिया ही डूब जाए! क्या हैं ग्रीनहाउस गैसें ग्रीन हाउस गैसों में कुल छह गैसें शामिल हैं। ये हैं-कार्बनडायऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रोफ्लोरो कार्बन, परफ्लोरो कार्बन्स और सल्फर हेक्सा फ्लोराइड। ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक प्रक्रिया, कचरा उत्पादन और कृषि उत्पादन के जरिए ये गैसें पर्यावरण में समाती हैं। ग्लोबल वामिंüग पर चर्चा के वक्त सारा फोकस कार्बनडायऑक्साइड पर ही डाला जाता है। लेकिन यहां ये भी ध्यान रखना होगा कि कार्बनडायऑक्साइड पेडों और वनस्पतियों का भोजन है। मालदीव डूबा, हम भी डूबेंगे: गोपाल कृष्ण ग्लोबल वामिंüग के मुद्दे पर देश विदेश में दर्जनों बैठकों में शिरकत करने वाले पर्यावरण विशेषज्ञ गोपाल कृष्ण के मुताबिक सिर्फ मालदीव के डूबने की बात करना विकसित देशों की खुराफात है। ये सच है कि ग्लेशियर पिघलने का सबसे बडा खतरा मालदीव पर है, लेकिन भारत पर भी खतरा कुछ कम नहीं है। क्योंकि भारत की कोस्टलाइन (समुद्री इलाका) बहुत बडा है। खतरा मालदीव के साथ साथ, भारत, बांग्लादेश और नेपाल पर भी मंडरा रहा है। दरअसल ग्लोबल वामिंüग और ग्लेशियर पिघलने का खतरा जी 77 में शामिल सभी 131 विकासशील देशों पर है। इसका हिस्सा भारत भी है। पर्यावरण पर काम कर रही कई संस्थाओं के सलाहकार गोपाल कृष्ण का कहना है कि चीन ने ग्लोबल वामिंüग पर जो पहल की है, वो सही है, लेकिन अमरीका की हठधर्मिता इस खतरे को और भी बढा रही है। ग्लोबल वामिंüग पिछले ढाई सौ सालों से विकसित देशों में चल रही औद्योगिक क्रांति और उससे हुए प्रदूषण का नतीजा है। इसकी जिम्मेदारी अमरीका जैसे विकसित देशों की है। गोपाल कृष्ण कहते हैं कि क्योटो प्रोटोकाल के मुताबिक 150 साल तक जिन देशों ने प्रदूषण फैलाया, उसी के चलते जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। इनमें 37 देश शामिल हैं, इन देशों को प्रदूषण रोकना होगा। ग्लोबल वामिंüग रोकने के लिए जो कदम उठाने हैं वो विकसित देशों को उठाने हैं, विकासशील देशों को नहीं। भारत जैसे विकासशील देशों में जहां पर 83 करोड लोग 19-20 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से जीवनयापन होते हैं, उन पर ग्लोबल वामिंüग रोकने की जिम्मेदारी डालना कहां तक उचित है। पिघलते ग्लेशियर के इफेक्ट पश्चिम बंगाल का सुंदर वन खतरे में एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020 तक पश्चिम बंगाल के सुंदर वन इलाके का 15 फीसदी हिस्सा समुद्र में मिल जाएगा। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ पिघलनी शुरू हुई तो हालात और बदतर होंगे। 2000 द्वीप समुद्र में! इंडोनेशिया के पर्यावरण मंत्री इस खतरे से आगाह करते हुए कहते हैं कि ग्लोबल वामिंüग के चलते अगले 30 सालों में उनके देश के 18 हजार द्वीपों में से करीब दो हजार द्वीप समुद्र में समा जाएंगे। बढ जाएगा धरती का तापमान आईपीसीसी की पेरिस में जारी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2100 में धरती का तापमान 1.8 से लेकर चार डिग्री तक बढ जाएगा। ये रिपोर्ट 113 देशों के 3750 पर्यावरण वैज्ञानिकों ने तैयार की है। समुद्री सतह ऊपर उठी ग्लेशियर पिघलने के चलते समुद्र सतह का स्तर छह मीटर तक बढ सकता है। 21वीं सदी के अंत तक समुद्र सतह एक मीटर तक बढ सकती है। पिछली एक सदी में समुद्र जल की सतह 15 सेंटीमीटर तक उठ चुकी है। डूब जाएगी दुनिया पिघलते ग्लेशियर्स का ड्रैकुला मुंह फाडे मालदीव को निगलने के लिए बढ रहा है। हालात इसी तरह रहे तो मालदीव जल प्रलय का पहला शिकार बन सकता है। हिंद महासागर में स्थित छोटे से देश मालदीव में ग्लेशियर पिघलने के चलते जल प्रलय का खतरा सबसे ज्यादा है। पिछले दिनों मालदीव के कैबिनेट की एक अनोखी बैठक समुद्र गहराइयों में हुई। संदेश यही था कि अगर नहीं चेते तो डूब जाएंगे। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद ने इस बैठक में साफ कहा-हम डूब रहे हैं। मालदीव चाहता है कि दिसंबर में कोपेनहेगन में होने वाली बैठक में विश्व के नेता कार्बन उत्सर्जन में कटौती की संधि पर हस्ताक्षर करें। राष्ट्रपति ने इस बैठक में कहा,'अगर मालदीव को नहीं बचाया गया, तो कल दुनिया के बचने की भी उम्मीद मत कीजिए।' ग्लोबल वामिंüग के चलते पिघलते ग्लेशियर मालदीव और बांग्लादेश के लिए सबसे बडा खतरा बने हुए हैं। वैज्ञानिकों ने साफ कह दिया है कि ग्लोबल वामिंüग का पहला शिकार मालदीव ही बनेगा। खतरा सिर्फ मालदीव पर ही नहीं है, भारत के समुद्रतटीय इलाकों पर भी खतरा मंडरा रहा है। भारत के सुंदरवन डेल्टा के करीब सौ द्वीपों में से दो द्वीपों को समुद्र ने हाल ही में निगल लिया है और करीब एक दर्जन द्वीपों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। इन द्वीपों पर करीब दस हजार आदिवासियों की आबादी है। यदि ये द्वीप डूबते हैं तो यह आबादी भी डूब सकती है। ग्लेशियर पिघलने के खतरे से भारत और चीन चेत गए हैं। हाल ही में दोनों देशों में इस मसौदे पर बैठक हुई और तय किया गया कि ग्लेशियर पिघलने का अध्ययन करने और वास्तविक स्थिति जानने के लिए दोनों देश एक दल भेजेंगे। दोनों देशों को ये पता है कि पिघलते ग्लेशियर से कई ऎसी नदियों में बाढ आ जाएगी, जिनके किनारे लाखों लोग बसते हैं। भारत और चीन के वैज्ञानिक और पर्वतारोही अब उन ग्लेशियरों पर जाएंगे, जहां से सतलुज और ब्र±मपुत्र नदियां निकलती हैं। तिब्बत के पर्वतों से बहकर आई ये दोनों नदियां गंगा और सिंधु नदियों के साथ मिलकर उत्तर भारत और पडोसी देशों के करोडों लोगों को पानी मुहैया कराती हैं। वल्र्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्लूडब्लूएफ) ने हिमालय के ग्लेशियर पिघलने पर खासी चिंता जताई है। संस्था के मुताबिक ग्लेशियर पिघलने से आने वाले दिनों में करोडों लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड सकता है। यही नहीं भारत, चीन और नेपाल भयानक बाढ आ सकती है, लेकिन बाद में सूखे की स्थिति सामने आएगी। खतरा पूरी दुनिया पर है, लेकिन अभी भी विकसित देश भविष्य की इस प्राकृतिक प्रलय को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण से जुडे मुद्दों पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक सदी के आखिर तक ग्लोबल वामिंüग के चलते अफ्रीका में 18 करोड 40 लाख लोगों की मौत हो सकती है। अफ्रीका में बाढ, सूखा, अकाल और संघर्ष बढ रहे हैं जो लोगों की मौत का कारण बन सकते हैं। ग्लोबल वामिंüग के चलते पिघलते ग्लेशियरों का खतरा रोकने के लिए पूरी दुनिया को एकगजुट होना होगा। क्योंकि पिघलते ग्लेशियर के खतरे का सामना आज तो केवल मालदीव ही कर रहा है, लेकिन अब भी हम नहीं संभले तो हो सकता है आने वाले वक्त में पूरी दुनिया ही डूब जाए! क्या हैं ग्रीनहाउस गैसें ग्रीन हाउस गैसों में कुल छह गैसें शामिल हैं। ये हैं-कार्बनडायऑक्साइड, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रोफ्लोरो कार्बन, परफ्लोरो कार्बन्स और सल्फर हेक्सा फ्लोराइड। ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक प्रक्रिया, कचरा उत्पादन और कृषि उत्पादन के जरिए ये गैसें पर्यावरण में समाती हैं। ग्लोबल वामिंüग पर चर्चा के वक्त सारा फोकस कार्बनडायऑक्साइड पर ही डाला जाता है। लेकिन यहां ये भी ध्यान रखना होगा कि कार्बनडायऑक्साइड पेडों और वनस्पतियों का भोजन है। मालदीव डूबा, हम भी डूबेंगे: गोपाल कृष्ण ग्लोबल वामिंüग के मुद्दे पर देश विदेश में दर्जनों बैठकों में शिरकत करने वाले पर्यावरण विशेषज्ञ गोपाल कृष्ण के मुताबिक सिर्फ मालदीव के डूबने की बात करना विकसित देशों की खुराफात है। ये सच है कि ग्लेशियर पिघलने का सबसे बडा खतरा मालदीव पर है, लेकिन भारत पर भी खतरा कुछ कम नहीं है। क्योंकि भारत की कोस्टलाइन (समुद्री इलाका) बहुत बडा है। खतरा मालदीव के साथ साथ, भारत, बांग्लादेश और नेपाल पर भी मंडरा रहा है। दरअसल ग्लोबल वामिंüग और ग्लेशियर पिघलने का खतरा जी 77 में शामिल सभी 131 विकासशील देशों पर है। इसका हिस्सा भारत भी है। पर्यावरण पर काम कर रही कई संस्थाओं के सलाहकार गोपाल कृष्ण का कहना है कि चीन ने ग्लोबल वामिंüग पर जो पहल की है, वो सही है, लेकिन अमरीका की हठधर्मिता इस खतरे को और भी बढा रही है। ग्लोबल वामिंüग पिछले ढाई सौ सालों से विकसित देशों में चल रही औद्योगिक क्रांति और उससे हुए प्रदूषण का नतीजा है। इसकी जिम्मेदारी अमरीका जैसे विकसित देशों की है। गोपाल कृष्ण कहते हैं कि क्योटो प्रोटोकाल के मुताबिक 150 साल तक जिन देशों ने प्रदूषण फैलाया, उसी के चलते जलवायु में परिवर्तन हो रहा है। इनमें 37 देश शामिल हैं, इन देशों को प्रदूषण रोकना होगा। ग्लोबल वामिंüग रोकने के लिए जो कदम उठाने हैं वो विकसित देशों को उठाने हैं, विकासशील देशों को नहीं। भारत जैसे विकासशील देशों में जहां पर 83 करोड लोग 19-20 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से जीवनयापन होते हैं, उन पर ग्लोबल वामिंüग रोकने की जिम्मेदारी डालना कहां तक उचित है। पिघलते ग्लेशियर के इफेक्ट पश्चिम बंगाल का सुंदर वन खतरे में एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020 तक पश्चिम बंगाल के सुंदर वन इलाके का 15 फीसदी हिस्सा समुद्र में मिल जाएगा। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ पिघलनी शुरू हुई तो हालात और बदतर होंगे। 2000 द्वीप समुद्र में! इंडोनेशिया के पर्यावरण मंत्री इस खतरे से आगाह करते हुए कहते हैं कि ग्लोबल वामिंüग के चलते अगले 30 सालों में उनके देश के 18 हजार द्वीपों में से करीब दो हजार द्वीप समुद्र में समा जाएंगे। बढ जाएगा धरती का तापमान आईपीसीसी की पेरिस में जारी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2100 में धरती का तापमान 1.8 से लेकर चार डिग्री तक बढ जाएगा। ये रिपोर्ट 113 देशों के 3750 पर्यावरण वैज्ञानिकों ने तैयार की है। समुद्री सतह ऊपर उठी ग्लेशियर पिघलने के चलते समुद्र सतह का स्तर छह मीटर तक बढ सकता है। 21वीं सदी के अंत तक समुद्र सतह एक मीटर तक बढ सकती है। पिछली एक सदी में समुद्र जल की सतह 15 सेंटीमीटर तक उठ चुकी है। | ||||
Saturday, March 6, 2010
डूब जाएगी दुनिया
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