tσ ℓινє α ℓιfє ι ηєє∂ α нєαяt,
tσ нανє α нєαяt ι ηєє∂ нαριηєѕѕ,
tσ нανє нαριηєѕѕ ι ηєє∂ fяιєη∂ѕнιρ
αη∂
tσ нαvє fяιєη∂ѕнιρ ι ηєє∂ υfσяєνєя

जे हाल विच सजना तू राजी ते रब राजी ,जे सी मैहे हार गया तो कि होंदा!
मैहे जीत दा जसन मनाऊंगा, इही जनम विच नहीं पाया अगले जन्म विच पावांगा !
ऐ जिंदगी तुझे जी लेंगे हम !विष दो या अमृत पी लेंगे हम !
आशुओं पर मत जा एक मोका तो दे ,रोते हुए भी हंस लेंगे हम!
Kathys Comments Kathys Comments

Friday, March 5, 2010

शब्द

शब्दों ने स्याही का
लिबास पहना
और वे कविता हो गए
अब वे किसी को
जख्मी नहीं कर सकते।
कविता जख्म करती नहीं
भरती है
अब वे किसी से
कुछ भी वसूल नहीं पाएंगे
कविता सिर्फ
देना जानती है
वसूलना नहीं।

जिस तरह शब्दों ने
स्याही का लिबास पहना
वैसे ही आदमी भी
पहनता है शब्दों को
मगर उसमें नहीं होता
कोई परिवर्तन।
होता यह है कि
वह भेड से भेडिया
बन जाता है
शब्द पहनते ही
सूख जाती है
उसकी सारी नमी
और वह सूखे काठ की तरह
तन जाता है
कभी-कभी
सोचता हूं
शब्द और शब्द में
इतना फर्क क्यों है


No comments:

Post a Comment