लिबास पहना
और वे कविता हो गए
अब वे किसी को
जख्मी नहीं कर सकते।
कविता जख्म करती नहीं
भरती है
अब वे किसी से
कुछ भी वसूल नहीं पाएंगे
कविता सिर्फ
देना जानती है
वसूलना नहीं।
जिस तरह शब्दों ने
स्याही का लिबास पहना
वैसे ही आदमी भी
पहनता है शब्दों को
मगर उसमें नहीं होता
कोई परिवर्तन।
होता यह है कि
वह भेड से भेडिया
बन जाता है
शब्द पहनते ही
सूख जाती है
उसकी सारी नमी
और वह सूखे काठ की तरह
तन जाता है
कभी-कभी
सोचता हूं
शब्द और शब्द में
इतना फर्क क्यों है



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